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अमेरिका में मिडटर्म चुनाव से पहले कॉरपोरेट चंदे की जंग तेज, क्रिप्टो-एआई और बेटिंग कंपनियां बनीं नई ताकत

Brief By Jagran.com / 1:52 PM on 24 Aug 2026


अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म इलेक्शन से पहले चुनावी चंदे को लेकर मुकाबला तेज हो गया है. इस बार वॉल स्ट्रीट, तेल और फार्मा जैसी पारंपरिक फंडिंग ताकतों के साथ क्रिप्टो, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑनलाइन बेटिंग कंपनियां भी बड़ी भूमिका में नजर आ रही हैं. जनवरी 2025 से मार्च 2026 के बीच इन क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियों ने करीब 2,800 करोड़ रुपये का चुनावी चंदा दिया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसमें लगभग 63 फीसदी यानी करीब 1,764 करोड़ रुपये रिपब्लिकन पार्टी या उससे जुड़े नेताओं के समर्थन में गया. 2010 से 2024 के बीच कॉरपोरेट फंडिंग का बड़ा हिस्सा रिपब्लिकन समर्थक समूहों की ओर गया था, लेकिन इस बार क्रिप्टो कंपनियों ने किसी एक पार्टी के बजाय अपने हितों के अनुकूल उम्मीदवारों का समर्थन करने की रणनीति अपनाई है.

अमेरिका में कंपनियां संघीय उम्मीदवारों या राजनीतिक दलों को सीधे मनमाने तरीके से चुनावी चंदा नहीं दे सकतीं. राजनीतिक फंडिंग के लिए कंपनियां आमतौर पर PAC और Super PAC जैसे माध्यमों का इस्तेमाल करती हैं. PAC यानी Political Action Committee कर्मचारियों और शेयरधारकों से धन जुटाकर कानूनी सीमा के भीतर उम्मीदवारों को समर्थन दे सकती है. वहीं Super PAC कंपनियों, अरबपतियों और संगठनों से असीमित धन जुटा सकता है. हालांकि Super PAC किसी उम्मीदवार को सीधे चंदा नहीं देता, लेकिन उसके समर्थन या विरोध में स्वतंत्र रूप से असीमित रकम खर्च कर सकता है. इसके अलावा Dark Money के जरिए भी राजनीतिक गतिविधियों में पैसा पहुंचता है, जिसमें फंडिंग के वास्तविक स्रोत की जानकारी सार्वजनिक नहीं होती.

भारत और अमेरिका के राजनीतिक फंडिंग सिस्टम में भी बड़ा अंतर है. भारत में Super PAC जैसी अलग व्यवस्था नहीं है. यहां कंपनियां राजनीतिक दलों को सीधे या Electoral Trust के माध्यम से चंदा दे सकती हैं. Electoral Trust राजनीतिक दलों को धन उपलब्ध कराता है, जबकि अमेरिका में Super PAC खुद किसी उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष में प्रचार अभियान पर खर्च कर सकता है. यही वजह है कि अमेरिकी चुनावों में कॉरपोरेट और बड़े दानदाताओं की भूमिका अक्सर चुनावी रणनीति और राजनीतिक प्राथमिकताओं को प्रभावित करने वाली मानी जाती है. इस बार क्रिप्टो, एआई और ऑनलाइन बेटिंग उद्योग की बढ़ती भागीदारी ने अमेरिकी चुनावी फंडिंग की तस्वीर को और बदल दिया है.

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