Brief By Newsbrief / 12:34 PM on 14 Jul 2026
भगवान जगन्नाथ की अनोखी प्रतिमा सदियों से श्रद्धालुओं के मन में जिज्ञासा जगाती रही है. बड़ी गोल आंखें और अधूरा दिखाई देने वाला स्वरूप उन्हें अन्य देवी-देवताओं से अलग बनाता है. ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की इसी प्रतिमा की पूजा की जाती है.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे. उन्होंने भगवान की प्रतिमा बनाने के लिए दिव्य शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा को आमंत्रित किया. विश्वकर्मा ने शर्त रखी कि प्रतिमा निर्माण पूरा होने तक कोई भी व्यक्ति कक्ष का द्वार नहीं खोलेगा. यदि ऐसा हुआ तो वह काम अधूरा छोड़ देंगे.
कई दिनों तक निर्माण कार्य चलता रहा, लेकिन एक दिन अंदर से कोई आवाज नहीं आने पर राजा इंद्रद्युम्न से धैर्य नहीं रहा और उन्होंने कक्ष का द्वार खोल दिया. शर्त भंग होते ही भगवान विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए और प्रतिमाएं अधूरी रह गईं. तभी से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के इसी स्वरूप की पूजा की जाती है.
एक अन्य मान्यता के अनुसार, राजा की रानी भगवान के दर्शन की उत्सुकता में कक्ष का द्वार खोल बैठीं, जिसके कारण प्रतिमा निर्माण अधूरा रह गया. धार्मिक विद्वानों का मानना है कि भगवान जगन्नाथ का यह स्वरूप संदेश देता है कि ईश्वर किसी एक रूप या आकार तक सीमित नहीं हैं. उनका अस्तित्व अनंत, असीम और संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है. यही विश्वास इस अनोखी प्रतिमा को करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनाता है.