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रोजो पर्व में झूले, लोकगीत और परंपरा का संगम, गुवा में दिखी ओड़िआ संस्कृति की रंगीन छटा

Brief By Newsbrief / 11:17 AM on 15 Jun 2026


चाईबासा के गुवा और आसपास के क्षेत्रों में ओड़िआ समाज का पारंपरिक लोकपर्व रोजो पूरे उत्साह, श्रद्धा और सांस्कृतिक उल्लास के साथ मनाया गया. पर्व के पहले दिन सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी. महिलाओं, युवतियों और बच्चों ने नए वस्त्र धारण कर पूजा-अर्चना की तथा परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की.

पर्व के अवसर पर छोटी बच्चियों और कुंवारी कन्याओं ने हाथों में मेहंदी रचाई और पारंपरिक झूलों का आनंद लिया. गांवों और बस्तियों में जगह-जगह झूले लगाए गए थे, जहां युवतियां पारंपरिक ओड़िआ लोकगीत गाकर उत्सव की खुशियां साझा करती नजर आईं. लोकगीतों की मधुर धुन और झूलों की रौनक ने पूरे क्षेत्र को उत्सवमय बना दिया.

रोजो पर्व के दौरान घरों में चावल के आटे से बने विभिन्न पारंपरिक व्यंजन और पकवान तैयार किए गए. परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलकर इस विशेष पर्व का आनंद लेते दिखे. यह चार दिनों तक चलने वाला उत्सव है, जिसमें पहिली रोजो, रोजो संक्रांति (मिथुन संक्रांति), बासी रोजो और बसुमती स्नान जैसे प्रमुख आयोजन शामिल हैं.

लोकमान्यता के अनुसार, रोजो पर्व वर्षा ऋतु के आगमन का संदेश देता है और धरती माता तथा नारीत्व के सम्मान का प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि ओड़िआ समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक एकता और पारंपरिक मूल्यों को भी सशक्त रूप से प्रदर्शित करता है.

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