Brief By Jagran.com / 6:29 PM on 03 Oct 2026
कलकत्ता हाई कोर्ट ने सोशल मीडिया पर जाति का उल्लेख करते हुए की गई अपमानजनक टिप्पणी को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) कानून के तहत ‘जनसमक्ष अपमान’ केवल सड़क, बाजार या किसी अन्य भौतिक सार्वजनिक स्थान तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर की गई जातिसूचक और अपमानजनक टिप्पणी भी परिस्थितियों के आधार पर इस कानून के दायरे में आ सकती है. मामला अनुसूचित जाति समुदाय से जुड़े एक शिकायतकर्ता की याचिका से संबंधित है, जिसने रबिउल इस्लाम बुलबुल और सायन दत्त के खिलाफ बेहाला थाने में शिकायत दर्ज कराई थी.
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि दोनों आरोपियों ने फेसबुक पर उनकी जाति, धर्म और परिवार को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं. शिकायत के साथ कथित फेसबुक पोस्ट के स्क्रीनशॉट भी पुलिस को सौंपे गए थे. वर्ष 2022 में मामला दर्ज होने के बाद पुलिस ने गवाहों के बयान और फेसबुक लिंक समेत अन्य तथ्यों की जांच की. हालांकि, 20 जनवरी 2023 को पुलिस ने कोई ठोस सुराग नहीं मिलने का हवाला देते हुए ‘नील’ फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी. पुलिस का कहना था कि साइबर थाने के जरिए फेसबुक से संबंधित यूजर की जानकारी मांगी गई थी, लेकिन कंपनी से जरूरी जानकारी नहीं मिल सकी. बाद में अलीपुर की विशेष अदालत ने शिकायतकर्ता की आपत्ति खारिज करते हुए पुलिस की रिपोर्ट स्वीकार कर ली.
इसके बाद शिकायतकर्ता ने विशेष अदालत के फैसले को कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती दी. न्यायमूर्ति उदय कुमार ने पुलिस की फाइनल रिपोर्ट को खारिज करते हुए मामले की नए सिरे से जांच कराने का निर्देश दिया. अदालत ने कहा कि जांच में साइबर-फोरेंसिक विशेषज्ञों की मदद ली जाए. हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एससी-एसटी कानून में ‘जनसमक्ष अपमान’ की अवधारणा डिजिटल मंचों तक भी लागू हो सकती है. हालांकि, किसी मामले में कानून की धाराएं लागू होंगी या नहीं, यह संबंधित तथ्यों और जांच में सामने आए सबूतों पर निर्भर करेगा.